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Saturday, 24 March 2018

भुत क्या होते है ? भुत से कैसे बचे ?

सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में वास करती है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासना और कामनामय शरीर में निवास होता है तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। यह आत्मा जब सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, उस उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।

भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि कहा जाता है।

भूतों के प्रकार :हिन्दू धर्म में गति और कर्म अनुसार मरने वाले लोगों का विभाजन किया है- भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वेताल और क्षेत्रपाल। उक्त सभी के उप भाग भी होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार 18 प्रकार के प्रेत होते हैं। भूत सबसे शुरुआती पद है या कहें कि जब कोई आम व्यक्ति मरता है तो सर्वप्रथम भूत ही बनता है।

इसी तरह जब कोई स्त्री मरती है तो उसे अलग नामों से जाना जाता है। माना गया है कि प्रसुता, स्त्री या नवयुवती मरती है तो चुड़ैल बन जाती है और जब कोई कुंवारी कन्या मरती है तो उसे देवी कहते हैं। जो स्त्री बुरे कर्मों वाली है उसे डायन या डाकिनी करते हैं। इन सभी की उत्पति अपने पापों, व्याभिचार से, अकाल मृत्यु से या श्राद्ध न होने से होती है।

84लाख योनियां :पशुयोनि, पक्षीयोनि, मनुष्य योनि में जीवन यापन करने वाली आत्माएं मरने के बाद अदृश्य भूत-प्रेत योनि में चले जाते हैं। आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। ऐसी 84 लाख योनियां है, जिसमें कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष और मानव आदि सभी शामिल हैं।

प्रेतयोनि में जाने वाले लोग अदृश्य और बलवान हो जाते हैं। लेकिन सभी मरने वाले इसी योनि में नहीं जाते और सभी मरने वाले अदृश्य तो होते हैं लेकिन बलवान नहीं होते। यह आत्मा के कर्म और गति पर निर्भर करता है। बहुत से भूत या प्रेत योनि में न जाकर पुन: गर्भधारण कर मानव बन जाते हैं।

पितृ पक्ष में हिन्दू अपने पितरों का तर्पण करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि पितरों का अस्तित्व आत्मा अथवा भूत-प्रेत के रूप में होता है। गरुड़ पुराण में भूत-प्रेतों के विषय में विस्तृत वर्णन मिलता है। श्रीमद्‍भागवत पुराण में भी धुंधकारी के प्रेत बन जाने का वर्णन आता है।

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अतृप्त आत्माएं बनती है भूत :जो व्यक्ति भूखा, प्यासा, संभोगसुख से विरक्त, राग, क्रोध,द्वेष, लोभ, वासना आदि इच्छाएं और भावनाएं लेकर मरा है अवश्य ही वह भूत बनकर भटकता है। और जो व्यक्ति दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या आदि से मरा है वह भी भू‍त बनकर भटकता है। ऐसे व्यक्तियों की आत्मा को तृप्त करने के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। जो लोग अपने स्वजनों और पितरों का श्राद्ध और तर्पण नहीं करतेवेउन अतृप्त आत्माओं द्वारापरेशान होते हैं।

यम नाम की वायु :वेद अनुसार मृत्युकाल में 'यम' नामक वायु में कुछ काल तक आत्मा स्थिर रहने के बाद पुन: गर्भधारण करती है। जब आत्मा गर्भ में प्रवश करती है तब वह गहरी सुषुप्ति अवस्था में होती है। जन्म से पूर्व भी वह इसी अवस्था में ही रहती है। जो आत्मा ज्यादा स्मृतिवान या ध्यानी है उसे ही अपने मरने का ज्ञान होता है और वही भूत बनती है।

जन्म मरण का चक्र :जिस तरह सुषुप्ति से स्वप्न और स्वप्न से आत्मा जाग्रति में जाती हैं उसी तरह मृत्युकाल में वह जाग्रति से स्वप्न और स्वप्न से सु‍षुप्ति में चली जाती हैं फिर सुषुप्ति से गहन सुषुप्ति में। यह चक्र चलता रहता है।

भूत की भावना :भूतों को खाने की इच्छा अधिक रहती है। इन्हें प्यास भी अधिक लगती है, लेकिन तृप्ति नहीं मिल पाती है।येबहुत दुखी और चिड़चिड़ा होते हैं। यह हर समय इस बात की खोज करते रहते हैं कि कोई मुक्ति देने वाला मिले। ये कभी घर में तो कभी जंगल में भटकते रहते हैं।

भूत की स्थिति :ज्यादा शोर, उजाला और मंत्र उच्चारण से यह दूर रहते हैं। इसीलिए इन्हें कृष्ण पक्ष ज्यादा पसंद है और तेरस, चौदस तथा अमावस्या को यह मजबूत स्थिति में रहकर सक्रिय रहते हैं। भूत-प्रेत प्रायः उन स्थानों में दृष्टिगत होते हैं जिन स्थानों से मृतक का अपने जीवनकाल में संबंध रहा है या जो एकांत में स्थित है।बहुत दिनों से खाली पड़े घर या बंगले में भी भूतों का वास हो जाता है

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भूत की ताकत :भूत अदृश्य होते हैं। भूत-प्रेतों के शरीर धुंधलके तथा वायु से बने होते हैं अर्थात् वे शरीर-विहीन होते हैं। इसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं। आयुर्वेद अनुसार यह 17 तत्वों से बना होता है। कुछ भूत अपने इस शरीर की ताकत को समझ कर उसका इस्तेमाल करना जानते हैं तो कुछ नहीं।

कुछ भूतों में स्पर्श करने की ताकत होती है तो कुछ में नहीं। जो भूत स्पर्श करने की ताकत रखता है वह बड़े से बड़ेपेड़ों को भी उखाड़ कर फेंक सकता है। ऐसे भूत यदि बुरे हैं तो खतरनाक होते हैं। यह किसी भी देहधारी (व्यक्ति) को अपने होने का अहसास करा देते हैं।

इस तरह के भूतों की मानसिक शक्ति इतनी बलशाली होती है कि यह किसी भी व्यक्ति का दिमाग पलट कर उससे अच्छा या बुरा कार्य करा सकते हैं। यह भी कि यह किसी भी व्यक्ति के शरीर का इस्तेमाल करना भी जानते हैं।

ठोसपन न होने के कारण ही भूत को यदि गोली, तलवार, लाठी आदि मारी जाए तो उस पर उनका कोई प्रभाव नहीं होता। भूत में सुख-दुःख अनुभव करने की क्षमता अवश्य होती है। क्योंकि उनके वाह्यकरण में वायु तथा आकाश और अंतःकरण में मन, बुद्धि और चित्त संज्ञाशून्य होती है इसलिए वह केवल सुख-दुःख का ही अनुभव कर सकते हैं।

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अच्‍छी और बुरी आत्मा :वासना के अच्छे और बुरे भाव के कारण मृतात्माओं को भीअच्छा और बुरमाना गयाहै। जहां अच्छी मृतात्माओं का वास होता है उसे पितृलोक तथा बुरी आत्मा का वास होता है उसे प्रेतलोक आदि कहते हैं।

अच्छे और बुरे स्वभाव की आत्माएं ऐसे लोगों को तलाश करती है जो उनकी वासनाओं की पूर्ति कर सकता है। बुरी आत्माएं उन लोगों को तलाश करती हैं जो कुकर्मी, अधर्मी, वासनामय जीवन जीने वाले लोग हैं। फिर वह आत्माएं उन लोगों के गुण-कर्म, स्वभाव के अनुसार अपनी इच्छाओं की पूर्ति करती है।

जिस मानसिकता, प्रवृत्ति, कुकर्म, सत्कर्मों आदि के लोग होते हैं उसी के अनुरूप आत्मा उनमेंप्रवेश करती है। अधिकांशतः लोगों को इसका पता नहीं चल पाता। अच्छी आत्माएं अच्छे कर्म करने वालों के माध्यम से तृप्त होकर उसे भी तृप्त करती है और बुरी आत्माएं बुरे कर्म वालों के माध्यम से तृप्त होकर उसे बुराई के लिए और प्रेरित करती है। इसीलिए धर्म अनुसार अच्छे कर्म के अलावा धार्मिकता और ईश्वर भक्ति होना जरूरी है तभी आप दोनों ही प्रकार की आत्मा से बचे रहेंगे।

कौन बनता है भूत का शिकार :धर्म के नियम अनुसार जो लोग तिथि और पवित्रता को नहीं मानते हैं, जो ईश्वर, देवता और गुरु का अपमान करते हैं और जो पाप कर्म में ही सदा रत रहते हैं ऐसे लोग आसानी से भूतों के चंगुल में आ सकते हैं।

इनमें से कुछ लोगों को पता ही नहीं चल पाता है कि हम पर शासन करने वाला कोई भूत है। जिन लोगों की मानसिक शक्ति बहुत कमजोर होती है उन पर ये भूत सीधे-सीधे शासन करते हैं।

जो लोग रात्रि के कर्म और अनुष्ठान करते हैं और जो निशाचारी हैं वह आसानी से भूतों के शिकार बन जाते हैं। हिन्दू धर्म अनुसार किसी भी प्रकार का धार्मिक और मांगलिक कार्य रात्रि में नहीं किया जाता। रात्रि के कर्म करने वाले भूत, पिशाच, राक्षस और प्रेतयोनि के होते हैं।

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हिन्दू धर्म में भूतों से बचने के अनेकों उपाय बताए गए हैं। पहला धार्मिक उपाय यह कि गले में ॐ या रुद्राक्ष का लाकेट पहने, सदा हनुमानजी का स्मरण करें। चतुर्थी, तेरस, चौदस और अमावस्य को पवि‍त्रता का पालन करें। शराब न पीएं और न ही मांस का सेवन करें। सिर पर चंदन का तिलक लगाएं। हाथ में मौली (नाड़ा) अवश्य बांधकर रखें।

घर में रात्रि को भोजन पश्चात सोने से पूर्व चांदी की कटोरी में देवस्थान पर कपूरर लौंग जला दें। इससे आकस्मिक, दैहिक, दैविक एवं भौतिक संकटों से मुक्त मिलती है।

प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में धतूरे का पौधा जड़ सहित उखाड़कर उसे ऐसा धरती में दबाएं कि जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाए। इस उपाय से घर में प्रेतबाधा नहीं रहत

प्रेत बाधा निवारक हनुमत मंत्र- ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम्‌ क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा। इस हनुमान मंत्र का पांच बार जाप करने से भूत कभी भी निकट नहीं आ सकते।

हनुमान जी के बाद मां कालका के स्मरण मात्र से किसी भी प्रकार की भूतबाधा है तो तत्काल ही हट जाती है। मां काली के कालिका पुराण में कई मंत्रों का उल्लेख मिलता है

सरसों के तेल का या शुद्ध घी का दिया जलाकर काजल बनालें। ये काजल लगाने से भूत, प्रेत, पिशाच आदि से रक्षा होती है और बुरी नजर से भी रक्षा होती है।

चरक संहिता में प्रेत बाधा से पीड़ित रोगी के निदान के उपाय विस्तार से मिलते हैं। ज्योतिष साहित्य के मूल ग्रंथों- प्रश्नमार्ग, वृहत्पराषर, होरा सार, फलदीपिका, मानसागरी आदि में ज्योतिषीय योग हैं जो प्रेत पीड़ा, पितृदोष आदि बाधाओं से मुक्ति का उपाय बताते हैं। अथर्ववेद में दुष्ट आत्माओं को भगाने से संबंधित अनेक उपायों का वर्णन मिलता है।

सावधानी :नदी, पूल या सड़क पार करते समय भगवान का स्मरण जरूर करें। एकांत में शयन या यात्रा करते समय पवित्रता का ध्यान रखें। पेशाब करने के बाद धेला अवश्य लें और जगह देखकर ही पेशाब करें। रात्रि में सोने से पूर्व भूत-प्रेत पर चर्चा न करें। किसी भी प्राकार के टोने-टोटकों से बच कर रहें।

ऐसे स्थान पर न जाएं जहां पर तांत्रिक अनुष्ठान होता हो, जहां पर किसी पशु की बलि दी जाती हो या जहां भी लोबान आदि धुंवे से भूत भगाने का दावा किया जाता हो। भूत भागाने वाले सभी स्थानों से बच कर रहें, क्योंकि यह धर्म और पवित्रता के विरुद्ध है।

जो लोग भूत, प्रेत या पितरों की उपासना करते हैं वह राक्षसी कर्म के होते हैं ऐसे लोगों का संपूर्ण जीवन ही भूतों के अधिन रहता है। भूत-प्रेत से बचने के लिए ऐसे कोई से भी टोने-टोटके न करें जो धर्म विरुद्ध हो। हो सकता है आपको इससे तात्कालिक लाभ मिल जाए, लेकिन अंतत: जीवन भर आपको परेशान ही रहना पड़ेगा।

अन्य उपाय :
यदि बच्चा बाहर से आए और थका, घबराया या परेशान सा लगे तो यह नजर लगने की पहचान है। ऐसे में उसके सर से 7 लाल मिर्च और एक चम्मच राई के दाने 7 बार घूमाकर उतारा कर लें और फिर आग में जला दें। यदि डरावने सपने आते हों, तो हनुमान चालीसा और गजेंद्र मोक्ष का पाठ करें और हनुमान मंदिर में हनुमानजी का श्रृंगार करें व चोला चढ़ाएं।

अशोक वृक्ष के सात पत्ते मंदिर में रख कर पूजा करें। उनके सूखने पर नए पत्ते रखें और पुराने पत्ते पीपल के पेड़ के नीचे रख दें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, घर भूत-प्रेत बाधा, नजर दोष आदि से मुक्त रहेगा।

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भूतादि से पीड़ित व्यक्ति की पहचान उसके स्वभाव एवं क्रिया में आए बदलाव से की जाती है। अगल-अलग स्वाभाव परिवर्तन अनुसार जाना जाता है कि व्यक्ति कौन से भूत से पीड़ित है।

भूत पीड़ा :यदि किसीव्यक्तिको भूत लग गया है तो वहपागल की तरह बात करने लगता है। मूढ़ होने पर भीवह किसीबुद्धिमान पुरुष जैसाव्यवहार भी करताहै। गुस्सा आने पर वह कई व्यक्तियों को एक साथ पछाड़ सकता है। उसकी आंखें लाल हो जाती हैं और देह मेंसदाकंपनबना रहताहै।

पिशाच पीड़ा :पिशाच प्रभावित व्यक्ति सदा खराब कर्म करना है जैसे नग्न हो जाना, नाली का पानी पीना, दूषित भोजन करना, कटु वचन कहना आदि। वह सदा गंदा रहता है और उसकी देह सेबदबू आती है। वह एकांत चाहता है।इससे वह कमजोर होता जाता है।

प्रेत पीड़ा :प्रेत से पीड़ित व्यक्ति चिल्लाता और इधर-उधर भागता रहता है। वह किसी का कहना नहीं सुनता। वह हर समय बुरा बोलता रहता है। वह खाता-पीता नही हैं और जोर-जोर से श्वास लेता रहता है।

शाकिनी पीड़ा :शाकिनी सेज्यादातरमहिलाएं ही पीड़ित रहती हैं।ऐसी महिला को पूरे बदन में दर्द बना रहता हैऔरउसकी आंखों में भीदर्द रहता है। वह अक्सर बेहोश भी हो जाती है। कांपते रहना, रोना और चिल्लाना उसकी आदत बन जाती है।

चुडैल पीड़ा :चुडैलभी ज्यादातर किसी माहिला को ही लगती है। ऐसी महिला यदि शाकाहारी भी है तो मांस खाने लग जाएगी। वह कम बोलती,लेकिन मुस्कुराती रहती है।ऐसी महिला कब क्या कर देगी कोई भरोसा नहीं।

यक्ष पीड़ा :यक्ष से पीड़ित व्यक्ति लाल रंग में रुचि लेने लगता है। उसकी आवाज धीमी और चाल तेज हो जाती है। वह ज्यादातर आंखों से इशारे कहता रहता है। इसकी आंखें तांबे जैसीऔर गोलदिखने लगती हैं।

ब्रह्मराक्षस पीड़ा :जब किसी व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस लग जाता है तो ऐसा व्यक्ति बहुत ही शक्तिशाली बन जाता है। वह हमेशा खामोश रहकर अनुशासन में जीवन यापन करता है। इसे ही जिन्न कहते हैं। यह बहुत सारा खाना खाते हैं और घंटों तक एक जैसे ही अवस्था में बैठे या खड़े रहते हैं। जिन्न से ग्रस्त व्यक्ति का जीवन सामान्य होता है ये घर के किसी सदस्य को परेशान भी नहीं करते हैं बस अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं। जिन्नों को किसी के शरीर से निकालना अत्यंत ही कठीन होता है

तरतरभूहोतहैजिनकअलअललक्षण और लक्ष्य होते हैं।

सोने के तरीके और उसके फायदे


पश्चिम दिशा में पैर करके सोने का तरीका (Sound sleep by Spiritual Exercise) : शांत निद्राकैसे लें, इस लेख में हम अध्ययन करेंगे कि पश्चिम दिशा में पैर करके सोना सबसे उत्तम सोने का तरीका कैसे होता है, इस विषय पर अध्ययन पूर्णत: आध्यात्मिक दृष्टिकोण से किया गया है । इससे हम योग्य निर्णय ले पाएंगे कि शांत निद्रा लेने के लिए हमें किस दिशा में पैर करके सोना चाहिए ।

पश्चिम दिशा में पैर करके सोने का तरीका- आध्यात्मिक प्रभाव

पश्चिम दिशा में पैर करके सोने से ईश्वर की क्रिया तरंगों से लाभ
ईश्वर की क्रिया तरंगें पूर्व-पश्चिम दिशा में रहती हैं । इन दो दिशाओं के मध्य इसकी गतिविधि रहती है । पश्चिम दिशा में पैर करने से हमें इन क्रिया तरंगों से अधिक लाभ मिलता है । यह हमें कार्य करने के लिए बल प्रदान करती है । इसलिए यह सबसे उत्तम सोने का तरीका है ।
पश्चिम दिशा में पैर करके सोने का तरीका- देह की पंचप्राण शक्ति का कार्यन्वित होना
क्रिया तरंगों का देह में संचार होने से, नाभी के स्तर पर स्थित पंचप्राण सक्रिय हो जाते हैं । यह पंचप्राण उपप्राण के माध्यम से सूक्ष्म वायु उत्सिजर्त करते हैं । पश्चिम दिशा में पैर करके सोने के से हमारे प्राण देह और पंच प्राणमय कोष की शुद्धि होती है । यह व्यक्ति को बल और स्फूर्ति प्रदान करती है ।

पश्चिम दिशा में पैर करके सोने का तरीका आजमाने से सात्विक तरंगों से लाभ
सूर्योदय के समय पूर्व दिशा से सात्विक तरंगें प्रक्षेपित होती हैं । जब हम अपने पैर पश्चिम दिशा में करके सोने का तरीका आजमाते हैं तब हमारा सिर पूर्व दिशा की तरफ होता है फलस्वरूप यह सात्विकतरंगें वातावरण से ब्रह्मरंध्र (७वां कुंडलिनी चक्रखोलती है) के द्वारा हमारे देह में सहजता से प्रवेश करती हैं । यह कुंडलिनी के सातवें चक्र सहस्रार चक्र को खोलती है । सात्विक तरंगें ग्रहण करने से हम भी सात्विक बन जाते हैं और हमारे दिन का आरंभ अधिक सात्विकता से होता है । अपने दिन का आरंभ सात्विकता से करने के लिए हमें अपने पैर पश्चिम दिशा में ही करके सोना चाहिए ।
देह चक्र का दक्षिणा वर्त घूमना (घडी की सुई की दिशा में घूमना)
ईश्वर की क्रिया तरंगें एवं सात्विक तरंगों के अतिरिक्त, इष्ट सप्ततरंगें भी पूर्व दिशा से आती हैं । जब हम अपना सिर पूर्व दिशा में करके सोते हैं, तब हम सप्ततरंगों से अधिकतम लाभ उठाते हैं । उसके प्रभाव से हमारा देह चक्र सही दिशा में दक्षिणावर्त घूमने लगता है । परिणामस्वरूप, हमारी सभी शारीरिक क्रियाएं सकारात्मक रूप से होती हैं । इसलिए पश्चिम दिशा में पैर करके सोना सबसे उत्तम सोने का तरीका है ।
पश्चिम दिशा में पैर करके सोने का तरीका आजमाने से निद्रा से संबंधित रज तमके कणों का घट जाना
जब हम अपने पैर पश्चिम में और सिर पूर्व में करके सोते हैं, तब कुंडलिनी के सात चक्रों द्वारा १० प्रतिशत अधिक सप्ततरंगें ग्रहण की जाती हैं । जब सप्ततरंगों से प्रभावित होकर चक्र दक्षिणावर्त दिशा में घूमने लगते हैं तब व्यक्ति को आध्यात्मिक स्तर पर उसका लाभ होता है । तथा निद्रा अवस्था में देह में उत्पन्न सूक्ष्म मूल रज तम कणों से व्यक्ति को कोई कष्ट नहीं होता और वह सोने का तरीका शांति प्रदान करता है ।
हम ऊपर दिए विवरण से जान सकते हैं कि शांत निद्रा लेने की दृष्टि से पूर्व-पश्चिम दिशा, अर्थात पश्चिम दिशा में पैर करके सोना सबसे उत्तम सोने का तरीका है ।

ध्यान करने के 100 लाभ

नियमित meditation अभ्यास के लाभों में अनेक प्रकार से सूचित किया गया है। ध्यान अभ्यास से मन का तनाव कम, शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का मजबूत बनना, बेहतर संगठित सोचना, एकाग्रता में सुधार, मन स्मृति में बढ़ावा, शोधन और तंत्रिका तंत्र के जागृति, जीव विज्ञान बुढ़ापे की प्रक्रिया का धीमा होना, प्रक्रिया धारणाएं और चेतना के राज्यों के लिए मस्तिष्क की क्षमता, और शरीर के अंगों, ग्रंथियों और सिस्टम का ठीक रहना होता है।

ध्यान के 5 लाभ | 5 benefits of meditation

  1. शांत चित्त
  2. अच्छी एकाग्रता
  3. बेहतर स्पष्टता
  4. बेहतर संवाद
  5. मस्तिस्क एवं शरीर का कायाकल्प व विश्राम

ध्यान के स्वास्थ्य लाभ | Health benefits of meditation

  • यह ऑक्सीजन की खपत कम करती है.
  • यह सांस की दर घट जाती है.
  • यह रक्त प्रवाह बढ़ता है और हृदय की दर को धीमा कर देती है.
  • व्यायाम सहिष्णुता बढ़ जाती है.
  • शारीरिक विश्राम के एक गहरे स्तर पर ले जाता है.
  • उच्च रक्तचाप के साथ लोगों के लिए अच्छा है.
  • खून लैक्टेट के स्तर को कम करके चिंता हमलों कम कर देता है.
  • मांसपेशियों में तनाव कम हो जाती है
  • एलर्जी जैसे पुराने रोगों, गठिया आदि में मदद करता है
  • पूर्व मासिक धर्म सिंड्रोम के लक्षण कम कर देता है.
  • पोस्ट ऑपरेटिव उपचार में मदद करता है.
  • प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाता है.
  • वायरस की गतिविधि और भावनात्मक संकट को कम कर देता है
  • ऊर्जा, शक्ति और उत्साह बढ़ाता है.
  • वजन घटाने में मदद करता है
  • मुक्त कण की कमी, कम ऊतकों को नुकसान
  • उच्च त्वचा प्रतिरोध
  • कोलेस्ट्रॉल के स्तर में गिरा, हृदय रोग के खतरे को कम करती है
  • बेहतर आसान साँस लेने में जिसके परिणामस्वरूप फेफड़ों के लिए हवा का प्रवाह.
  • उम्र बढ़ने की प्रक्रिया कम हो जाती है.
  • DHEAS के उच्च स्तर (Dehydroepiandrosterone)
  • पुरानी बीमारियों में से रोका, धीमा या नियंत्रित दर्द आप कम पसीना
  • इलाज सिरदर्द और माइग्रेन
  • दिमाग से काम के ग्रेटर सुव्यवस्था
  • चिकित्सा देखभाल के लिए कम की आवश्यकता
  • कम ऊर्जा व्यर्थ
  • खेल गतिविधियों के लिए इच्छुक
  • अस्थमा से महत्वपूर्ण राहत
  • एथलेटिक घटनाओं में बेहतर प्रदर्शन
  • अपने आदर्श वजन Normalizes
  • हमारे endocrine प्रणाली harmonizes
  • हमारे तंत्रिका तंत्र को आराम
  • मस्तिष्क विद्युत गतिविधि में स्थायी लाभकारी परिवर्तन निर्माण
  • इलाज बांझपन को विनियमित के रिलीज के साथ हस्तक्षेप कर सकते हैं में मदद करता है.
यह भी जरूरी पढ़े –

ध्यान के मानसिक लाभ | Mental Benefits of Meditation

  • व्यग्रता का कम होना
  • भावनात्मक स्थिरता में सुधार
  • रचनात्मकता में वृद्धि
  • प्रसन्नता में संवृद्धि
  • सहज बोध का विकसित होना
  • मानसिक शांति एवं स्पष्टता
  • परेशानियों का छोटा होना
  • ध्यान मस्तिस्क को केन्द्रित करते हुए कुशाग्र बनाता है तथा विश्राम प्रदान करते हुए विस्तारित करता है|
  • बिना विस्तारित हुए एक कुशाग्र बुद्धि क्रोध, तनाव व निराशा का कारण बनती है|
  • एक विस्तारित चेतना बिना कुशाग्रता के अकर्मण्य/ अविकसित अवस्था की ओर बढ़ती है|
  • कुशाग्र बुद्धि व विस्तारित चेतना का समन्वय पूर्णता लाता है|

ध्यान के 3 आध्यात्मिक लाभ | 3 Spiritual benefits of meditation

ध्यान का कोई धर्म नहीं है और किसी भी विचारधारा को मानने वाले इसका अभ्यास कर सकते हैं|
  1. मैं कुछ हूँ इस भाव को अनंत में प्रयास रहित तरीके से समाहित कर देना और स्वयं को अनंत ब्रह्मांड का अविभाज्य पात्र समझना|
  2. ध्यान की अवस्था में आप प्रसन्नता, शांति व अनंत के विस्तार में होते हैं और यही गुण पर्यावरण को प्रदान करते हैं, इस प्रकार आप सृष्टी से सामंजस्य में स्थापित हो जाते हैं|
  3. ध्यान आप में सत्यतापूर्वक वैयक्तिक परिवर्तन ला सकता है| क्रमशः आप अपने बारे में जितना ज्यादा जानते जायेंगे, प्राकृतिक रूप से आप स्वयं को ज्यादा खोज पाएंगे|

ध्यान के दौरान होने वाले अनुभव

आरम्भ में अपने ध्यान की गहराई तथा निजी आवश्यकताओं के अनुरूप ही हमें विविध प्रकार के अनुभव होते हैं। उदाहरण के लिए, एक नए ध्यानी को निम्नांकित अनुभवों में से कोई एक या एकाधिक अनुभव हो सकते हैं :
  1. अपने शरीर में हल्केपन या भारहीनता की अनुभूति होना मानो शरीर है ही नहीं।
  2. सिर अथवा शरीर के किसी अन्य भाग में भारीपन की अनुभूति होना।
  3. किसी किसी को रंग दिखाई देना, एक अथवा अनेक रंग।
  4. पीठ के निचले भाग में हल्के से लेकर तेज़ दर्द का होना।
  5. अपने अन्दर ऐसा अनुभव होना जैसे हम गोल – गोल घूम रहे हैं।
  6. किसी किसी को ऐसा लगना जैसे वह हवा में तैर रहा है या पक्षियों की तरह उड़ रहा है।
  7. प्राकृतिक दृश्यों, पूजा स्थलों, देवी देवताओं या गुरुओं के रूप स्पष्ट दिखाई देना। इसे हम दिव्य चक्षु द्वारा दिव्यदर्शन होना कहते हैं।

ध्यान के लाभ कैसे प्राप्त करें | How to experience meditation benefits

ध्यान के लाभों को महसूस करने के लिए नियमित अभ्यास आवश्यक है| प्रतिदिन यह कुछ ही समय लेता है| प्रतिदिन की दिनचर्या में एक बार आत्मसात कर लेने पर ध्यान दिन का सर्वश्रेष्ठ अंश बन जाता है| ध्यान एक बीज की तरह है| जब आप बीज को प्यार से विकसित करते हैं तो वह उतना ही खिलता जाता है. प्रतिदिन, सभी क्षेत्रों के व्यस्त व्यक्ति आभार पूर्वक अपने कार्यों को रोकते हैं और ध्यान के ताज़गी भरे क्षणों का आनंद लेते हैं| अपनी अनंत गहराइयों में जाएँ और जीवन को समृद्ध बनाएं|

छात्रों हेतु ध्यान के 5 लाभ | 5 Benefits of meditation for students

  1. आत्मविश्वास में वृद्धि
  2. अधिक केन्द्रित व स्पष्ट मन
  3. बेहतर स्वास्थ्य
  4. बेहतर मानसिक शक्ति व ऊर्जा
  5. अधिक गतिशीलता

Self confidence बढ़ाने के 10 तरीके


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बनाएं अधिक सुरक्षित अपने स्मार्टफोन को 5 आसान स्टेप्स में    एंड्रॉयड और आईओएस फोन्स को रखें वायरस और हैकिंग से सुरक्षित कंप्यूटर की...